मैं हिंदी हूँ, भारत की वाणी,
संस्कृति की धारा, शुद्ध और ज्ञानी।
हर शब्द मेरा सजीव प्रतीक,
हृदय की धड़कन, आत्मा की संगीत।
सभ्यता की गाथा, मैं कहती हूँ,
साहित्य की गहराई में बहती हूँ।
भाषाओं की इस दुनिया में,
अपनी पहचान लिए रहती हूँ।
मैं शब्दों का संगम, विचारों की धारा,
अहिंसा, प्रेम, सत्य का सहारा।
हर पीढ़ी के संग बढ़ती जाऊँ,
भारत के हृदय में बसती जाऊँ।
मैं हिंदी हूँ, सबका अभिमान,
मेरे संग चलता है सारा हिंदुस्तान।
जन-जन की हूँ मैं आवाज,
समाज का हूँ मैं सबसे प्रिय साज।