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बुधवार, 25 दिसंबर 2024

मैं हिंदी हूँ ( कविता)

                                 **मैं हिंदी हूँ**  

मैं हिंदी हूँ, भारत की वाणी,  
संस्कृति की धारा, शुद्ध और ज्ञानी।  
हर शब्द मेरा सजीव प्रतीक,  
हृदय की धड़कन, आत्मा की संगीत।  

सभ्यता की गाथा, मैं कहती हूँ,  
साहित्य की गहराई में बहती हूँ।  
भाषाओं की इस दुनिया में,  
अपनी पहचान लिए रहती हूँ।  

मैं शब्दों का संगम, विचारों की धारा,  
अहिंसा, प्रेम, सत्य का सहारा।  
हर पीढ़ी के संग बढ़ती जाऊँ,  
भारत के हृदय में बसती जाऊँ।  

मैं हिंदी हूँ, सबका अभिमान,  
मेरे संग चलता है सारा हिंदुस्तान।  
जन-जन की हूँ मैं आवाज,  
समाज का हूँ मैं सबसे प्रिय साज।

सपना (कविता)

                                  **सपना**

सपना वो नाजुक धागा है,  
जो रातों को बुनता है,  
कभी हंसाता, कभी रुलाता,  
नए संसार को चुनता है।  

आँखों में जो छवि बसाए,  
हर सुबह उसे जगाए,  
उम्मीदों के वो पंख लगाकर,  
आसमान तक उड़ान कराए।  

सपने में हैं छिपे अरमान,  
जिन्हें छूने का है सबको गुमान,  
कुछ अधूरे, कुछ पूरे से,  
पर हर एक में बसा है जहान।  

सपना टूटे तो दिल भी दुखता,  
पर फिर भी न हार मानता,  
क्योंकि ये तो वही सपना है,  
जो हर रात फिर से लौट आता।  

शुक्रवार, 27 सितंबर 2024

ये जिंदगी ( कविता)

                     **ये जिंदगी**

ये जिंदगी है एक सफर,  
रास्ते अजनबी, मंज़िलें बेखबर।  
हर मोड़ पर नए सवाल खड़े,  
हर पल में हैं सपनों के धागे जुड़े।

कभी हंसी की रौशनी में नहाई,  
कभी ग़म की छाया में खोई हुई।  
कभी उम्मीद की चिंगारी सी जली,  
कभी निराशा की लहरों में डूबी।

हर दिन एक नई कहानी लिखे,  
हर रात कुछ नए सपने बुनें।  
कभी हार, तो कभी जीत का गीत,  
ये जिंदगी बस चलने का रीत।

दिल में हौसला, आँखों में चमक,  
आगे बढ़ने की है ये दमक।  
समय की क़लम से लिखते रहो,  
ये जिंदगी है, इसे जीते रहो।