जहाँ देखो वहाँ भीड़ का मेला,
पर दिलों में सूना सन्नाटा फैला।
तकनीक बढ़ी, पर सोच घट गई,
इंसानियत फिर कहीं खो गई।
पैसे की खातिर रिश्ते बिकते,
सत्य के स्वर अब कम ही दिखते।
नेता वादों की चादर ओढ़े,
जनता सपनों में आँसू जोड़ें।
शिक्षा बनी है बस अंकों का खेल,
संस्कारों की कमी से मन है बेलगाम रेल।
ज्ञान का सागर उथला लगता,
जब नैतिकता का दीपक बुझता।
पर्यावरण रोता, नदियाँ गंदली,
पेड़ों की जगह अब इमारतें पक्की।
हवा में ज़हर, जल में जहरापन,
धरती माँ माँगे फिर अपनापन।
युवाओं में जोश, पर राह नहीं,
भविष्य का नक्शा साफ़ कहीं।
बेरोज़गारी की आँधी चलती,
उम्मीदें फिर भी मन में पलती।
महिलाओं की सुरक्षा सवाल बनी,
न्याय की डगर अब मुश्किल घनी।
भेदभाव की दीवारें ऊँची हैं,
पर आवाज़ें उठने लगीं सच्ची हैं।
मीडिया का सच अब बिकने लगा,
झूठ का चेहरा सजने लगा।
धर्म और जाति के नाम पे झगड़े,
इंसानियत के रिश्ते अब टूटे।
फिर भी एक किरण अब बाकी है,
हर दिल में अच्छाई की झाँकी है।
अगर बदलें सोच, जगाएँ भरोसा,
तो उजले कल का होगा सौदा।
*कवि व कहानीकार - काशी कुमार "निराला"*
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