कहानी - लकीर का मूल्य
मेरे घर के पास ही मेरे दोस्त रोहन का भी घर था I
भोला
–भला, सीधा –सदा सरल स्वभाव का रोहन I
हम दोनों में गहरी
दोस्ती थी I रोहन के घर की स्थिति
ठीक नहीं थी I पिता मजदूरी का काम करते थे I किसी
प्रकार घर का
गुजर - बसर चल जाता था I रोहन खूदगर्ज
लड़का था, आज तक कभी
कुछ मुझसे नहीं माँगा I फिर भी मुझसे जो
होता उसे दे दिया करता I एक दिन मेरे
पिता ने घर को बदलने की
बात किए, कारण पूछा – तो पता चला की पिता जी ऑफिस
काफ़ी दूर
होने के कारण आफिस जाने में काफ़ी समय लग जाता था इसलिए एक किराये
मकान को बदलना था I मकान बदलने
से मै बिलकुल
खुश नहीं था, क्योकि मै अपने दोस्त से दूर नहीं रहना
चाहता था I पिता जी का फ़ैसला था, इसलिए सभी को मानना पड़ा I
मैंने जब मकान
बदलने की बात रोहन से कहीI तो वो भी उदास हो
गया I रोहन कुछ सोच कर उदास
होकर मुझसे पूछा, क्या ? चाचा जी
तुम्हारा स्कूल भी बदल देंगे ? मैंने कहा - नहीं I
फिर वह
खुश हो गया I उसने कहा, चलो स्कूल में तो हमलोग साथ में
रहेंगे I मुझे
उसके चेहरे पर एक संतोष दिखा I धीरे –धीरे समय बीत रहा था I स्कूल में साथ में
बैठना, साथ में पढ़ना, साथ में खेलना – कूदना सब साथ –साथ चलता था I रोहन के साथ मेरी एक
गहरी दोस्ती थी I एक आतंरिक
लगाव –सा हो
गया था I गहरी दोस्ती जो थी I वैसे तो वो
प्रतिदिन
स्कूल आता था और पढ़ने में भी काफ़ी
अच्छा था I एक दिन रोहन को
स्कूल आने में
देरी हो गयी I जिसके कारण कक्षा
अध्यापक ने उसे कुछ देर बाहर
खड़ा
करके फिर कक्षा में भेज दिया I मैंने देर आने का
कारण पूछा - तो कोई जवाब नहीं दिया I हालांकि वह पहली बार देर से स्कूल आया था, इसलिए
अध्यापक ने रोहन को कोई दंड नहीं दिए I कुछ दिन और बीतने पर
रोहन अक्सर स्कूल देर से आने लगा और अब कक्षा अध्यापक के स्वभाव में भी परिवर्तन
हो चुका था I रोहन के ऊपर गुस्सा
होना स्वाभाविक- सा हो गया
था I मैंने रोहन से कई बार
स्कूल देर से आने का कारण पूछा I लेकिन कुछ बताने को
तैयार ना था Iमैंने सोचा - कल
रविवार है और मै कल
रोहन के घर जाऊंगा I दुसरे दिन यही सोचकर
मै घर पर बताकर सुबह –सुबह रोहन
के घर चला गया I मुझे सुबह -
सुबह अपने घर पर देख कर रोहन बेहद खुश था I रोहन स्कूल का
गृहकार्य कर रहा था I हम लोग घर के आगन में बैठे – बैठे बाते
कर रहे थे I चाची ने बिस्कुट और पानी दिए I मैंने बिस्कुट खाकर पानी पीया और बाते करने लगा I अचानक मेरी नज़र आगन में जमीन पर कुछ खीची लकीर पर पड़ी I लकीर
काफ़ी गहरी थी I मैंने पूछा - रोहन यह कैसी लकीर खीचें हो ?
रोहन पहले तो कुछ नहीं बोला I जब
मै बार –बार ज़ोर देकर पूछा I तो रोहन का जवाब सुनकर आश्चर्य का
ठिकाना नहीं रहा
I उसने कहा – तुम तो जानते हो की मेरे घर
में घड़ी नहीं है I सूर्य की रोशनी की परछाई
को एक दिन पड़ोसी
के घड़ी से मिलाकर नौ बजे का आंगन में जमीन पर लकीर खीच
दिया और जब सूर्य की रोशनी
की परछाई मेरी खीचीं गई लकीर के पास आ जाती है I
तो मुझे पता
चल जाता है की नौ बज गए है और मै स्कूल जाने लगता हूँ I मै स्तम्भ
हो कर उसकी गरीबी और
लाचारी भरी बाते सुन रहा था I मैंने पूछा- कि तो फिर कभी –
कभी स्कूल आने में देर क्यों हो जाती थी I उसने कहा - कभी -
कभी मौसम साफ़ ना
होने के कारण समय का पता नहीं चल पता था I
जिसके करना मुझे देर हो जाती थी I
रोहन से मिलकर अब मै अपने
घर जा रहा था I पर पूरे रास्ते मै अपने मित्र की गरीबी
और
लाचारी के बारे में सोचता रहा , कि मेरे दोस्त के जीवन में लकीर का कितना मूल्य
है
I जिसे देखकर वह स्कूल जाता है I समय
का पता लगाने में उसे कितनी तकलीफ़
होती होगी ? मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मै
अपने दोस्त की मदद कैसे करू ?
क्योकि मेरे पास भी पैसे नहीं थे I रात में मैंने अपने माता –पिता
से रोहन की लकीर
की सारी कथा कह सुनाये I माता – पिता
मेरी उदासी को समझ चुके थे, लेकिन कुछ
बोले नहीं I दुसरे दिन
शाम को पिता रोहन के लिए मुझे एक पैकेट दिए और कहे की
इस पैकेट को जाकर रोहन को दे
आओं I रोहन के घर जाकर पैकेट को रोहन को देने
लगा I उसने पूछा इस पैकेट के अन्दर क्या है ? मैंने कहा - तुम खुद देख लो I रोहन
पैकेट खोलकर देखा तो उसकी आँखों में आँसू भर आए I उस पैकेट में मेरे पिता ने रोहन
के लिए दीवार घड़ी दी थी I मैंने उसे अपने गले से लगा लिया और कहा - अब तुम्हे
स्कूल आने में देरी
ना होगी I




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